कालिंजर (अनछुए स्थल) प्रोजेक्ट रिपोर्ट


कालिंजर
प्रस्तावना: बुंदेलखण्ड वीरों को जन्म देने वाली धन-धान्य से समृद्ध एवं प्रकृति देवी की विश्राम भूमि है| इस भूमि के कण कण कण में शौर्य भरा हुआ है| यही कारण है कि यहाँ की अबलाओं ने भी वीरोचित साहसपूर्ण कार्य किये हैं, जिन्हें अछे-अछे रणकोविद धनुर्धर भी नहीं कर सकते| स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राणों की आहुति देने वाली महारानी लक्ष्मीबाई इसी वीरभूमि बुन्देलखण्ड में ही थीं| इसी बुन्देलखन में महाराजा  छत्रसाल जैसे शूरवीर राजाओं ने जन्म लेकर हिन्दू जाति एवं भारतीय संस्कृति की रक्षा की थी| बुंदेलखंड के जनपदों में बाँदा जनपद अपनी महान विशेषताओं के कारण प्रख्यात है| यह भूमि ऐतिहासिक, धार्मिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक सभी दृष्टियों से विशेष महत्वपूर्ण है| महर्षि नामदेव ने यहीं पर अपना सिद्धाश्रम बनाया था| महाराज विराट की नगरी यही बाँदा नगर ही है, जहाँ के पाण्डव लोगों ने अपने विपत्ति के दिनों में शरण पायी थी| इसी प्रकार इस परम्प्रसिद्ध बाँदा मंडल के अंतर्गत अनेक तीर्थ स्थान हैं| विन्ध्य गिरी की ङ्लाओं से सुशोभित होने वाले इस बुंदेलखंड की वीर प्रसवनी वसुंधरा के अंतर्गत बाँदा जनपद के दक्षिणी भाग में परम प्राचीन पुराण विख्यात ‘कालिंजर’ नाम का एक क्षेत्र है| यह क्षेत्र वैदिक काल से ही अपनी पवित्रता रमणीयता एवं नैतिकता के लिए विख्यात है| यह वह भूमि है जहाँ कालकूट विष की विषम वेदना संतप्त प्रभूत भावन भगवान शंकर ने भी आकर शांति प्राप्त की थी| यह वह अनादि सिद्ध तपोभूमि है जहाँ की जड़ भरत जैसे महान तपस्वी राजर्षि ने मृग का शारीर पाकर भी अपनी अंतरात्मा को शांति देने के लिए भ्रमण किया था| इस भूमि ने मानवता के जिन उच्च आदर्शों की प्रतिष्ठा की है उनका वर्णन करना असंभव है|


क्षेत्र की सत्ता  
कालिंजर का क्षेत्र परम प्राचीन है| पद्म पुराण में इसकी सीमा का विस्तार 4 मील तक लिखा है| कतिपय विशेषज्ञों का कहना है की पौराणिक काल के पूर्व इसका क्षेत्र 24 मील विस्तृत था| सतयुग में इसका नाम ‘कीर्तक’ था| त्रेतायुग में ‘महद्गिरी’, द्वापर में ‘पिंगल’ एवं कलयुग में ‘कालिंजर पर्वत’ नाम पड़ गया| यह क्षेत्र परम पुनीत एवं पाप नाशक है| सिर के रोग, नेत्र रोग तथा चरम रोगों को शमन करने की इसमें अद्वितीय शक्ति है| यह कालिंजर क्षेत्र प्राचीन काल में एक निविड़ वन में स्थित था| यहाँ तुङ्गक नामक ऋषि के निवास का भी पता चलता है| इन्हीं ऋषि के नाम के आधार पर सम्पूर्ण वन का नाम तुङकारण्य हो गया था| पितरों को शांति देने के लिए, उनका उद्धार करने के लिए यह क्षेत्र परम प्रख्यात था| इसी कारण गया में श्राद्ध करने से जो फल प्राप्त होता है वह फल कालिंजर में स्थित मृग क्षेत्र में श्राद्ध करने से मिलता है| श्राद्धकर्ता के सात गोत्रों तक के भ्रमित पितरों का उद्धार हो जाता है| यह कालिंजर क्षेत्र केवल पाप हर एवं पितृ उद्धारक ही नहीं है, प्रत्युत अनादि काल से सिद्ध तपोभूमि है| आदर्श योगी जड़भरत ने भी मृग रूप में आकर यहाँ शांति पायी थी| विशेष रूप से पाप नाशक क्षेत्र होने के कारण इसे ‘अधमर्षण’ नाम की संज्ञा प्राप्त हो गयी थी| आदि कलाकार सृष्टि निर्माता श्री ब्रह्मा जी ने भी सृष्टि रचना हेतु इसी अधमर्षण क्षेत्र में तप किया था|
          इस प्रकार कालिंजर का अस्तित्व सृष्टिकाल से लेकर आज पर्यन्त विभिन्न रूपों में सिद्ध होता है| शंकर जी का प्रसिद्ध स्थान होने के कारण शंकराचार्य जी ने भी इसे धार्मिक क्षेत्र बनाया| सतयुग, त्रेता और द्वापर तक कालिंजर का धार्मिक महत्त्व अत्यधिक रूप से ज्ञात होता है| इसके पश्चात कलयुग में राजनीतिक परिस्थितियों के कारण शासकों ने उक्त स्थानों को अति सुरक्षित समझ कर दुर्ग का निर्माण कर उसे राजनीतिक महत्त्व भी प्रदान किया|


                                                 कालिंजर महात्म्य   
जिस प्रकार गंगा यमुना का महत्त्व त्रिकाल में सत्य है, उसी प्रकार पाप विनाशक, शांति प्रदायक, तप संचायक कालिंजर गिरी का महात्म्य भी त्रिकाल में सत्य है| पर्वत में चढ़ने से इच्छानुसार फल की प्राप्ति होती है| कलयुग में कालिंजर के दर्शन मात्र से जीव मुक्त हो जाता है| समुद्रमंथन के प्रारंभ में भगवान विष्णु द्वारा विषपान निश्चय करने पर भगवान शंकर से प्रार्थना की गयी कि आप इसे पान करेंगे| जब भगवान शंकर ने उनकी प्रार्थना स्वीकार करके विषपान कर लिया तब वे नीलकण्ठ हो गए| तबसे भगवान नीलकण्ठ कालिंजर पर्वत में निवास करने लगे और अपने क्षेत्र में निवास करने वाले प्राणियों के लिए अर्थ, धर्म, काम तथा मोक्ष फल को प्रदान करने वाले हुए| यह क्षेत्र 4 मील के विस्तार से उन सभी प्राणियों को मुक्ति प्रदान करने वाला है, जो कि वहां जन्म लेते हैं, दीक्षा प्राप्त करते हैं, विवाह संस्कार करते हैं या मृत्यु प्राप्त करते हैं|जितना समय गोदोहन में लगता है यदि उतने समय भी कोई कालिंजर में निवास करता है, तो इसके दर्शन तथा स्पर्श से ब्रह्महत्या के पाप से भी मुक्त हो जाता है| कालिंजर के शिव क्षेत्र में सभी तीर्थ निवास करते हैं| यह परंपरा प्रत्येक युग से चली आ रही है| यह स्थान शिव की सानिध्य मुक्ति प्रदान करता है| जो व्यक्ति कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की पंचमी को वाणगंगा में स्नान करके शिव जी की प्रदक्षिणा करता है, वह शिव लोक में प्रतिष्ठा पाता है|
सौमित्र क्षेत्र का महत्व
कालिंजर के सौमित्र क्षेत्र में स्नान करने से मनुष्य राजस्य यज्ञ के फल को पता है, तथा ब्रह्म हत्या के पाप से भी मुक्त हो जाता है, इस प्रकार यह क्षेत्र समस्त पापों का नाशक है|कालिंजर पर्वत के उत्तर में श्री जानकी जी का स्थान है| उस स्थान का भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिए जो कि भगवान राम के लिए अत्यंत प्रीतिदायक है| उसी के समीप वाणगंगा नाम का स्थान है, जहाँ पर भक्तों को प्रेम के साथ विधिपूर्वक स्नान करना चाहिए| उसी के समीप पाण्डवों एवं भगवान कृष्ण के उत्तम दर्शन प्राप्त होते हैं|
कार्ययोजना
ऐसे ऐश्वर्यवान स्थल से पूर्णतयः परिचित होने के लिए,मुझे मेरे गुरु जी के आदेशानुसार, कालिंजर भ्रमण कर वहाँ के जल स्त्रोतों की स्थिति देखने को कहा गया| अतः मैंने अन्य गुरुओं के सहयोग से अपने सहपाठियों (सुशील एवं सुरेश) के साथ 10 दिसम्बर, 2018 को कालिंजर जाने की योजना बनाई| हम अतर्रा से बारास्ता नरैनी, कालिंजर पहुँचे, जहाँ मार्ग में ही पक्की सड़क अतर्रा से नरैनी के बीच निर्माणाधीन होने के कारण हमारे दुपहिया वाहन का अगला पहिया पंक्चर होने के कारण कुछ देर विलम्ब हो गया| अतः हम कालिंजर 1:00 बजे पहुँचे| फिर कुछ समय, पुरातत्व विभाग के टिकट काउंटर पर अपना सम्पूर्ण विवरण देकर टिकट लेने में, लग गया| इसके पश्चात हम सब लोगों ने अपने साथ ले जाया गया जल-पान ग्रहण किया| फिर सब लोग दर्शनीय स्थलों को देखने के लिए चल दिए| वहाँ से सारी जानकारियों को एकत्र करके शाम को 6:00 बजे हम चल दिए और 8:00 बजे अतर्रा वापिस आ गए|    
              
                                             ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

कालिंजर उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में स्थित कालिंजर बुंदेलखंड का ऐतिहासिक और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण नगर है| प्राचीन काल में यह जेजाकभुक्ति (जयशक्ति चंदेल) साम्राज्य के अधीन था| यहाँ का किला भारत का सबसे विशाल और अपराजेय किलों में एक माना जाता है| 9 वीं से 15 वीं शताब्दी तक यहाँ चंदेल शासकों का शासन था| चंदेल राजाओं के शासनकाल में कालिंजर पर महमूद गजनवी, कुतुबुद्दीन ऐबक, शेर शाह सूरी और हुमांयु ने आक्रमण किये लेकिन जीतने में असफल रहे| अनेक प्रयासों के बावजूद मुगल कालिंजर के किले को जीत नहीं पाए| अंततः 1569 में अकबर ने यह किला जीता और अपने नवरत्नों में एक बीरबल को उपहारस्वरुप प्रदान किया| बीरबल के बाद यह किला बुन्देल राजा छत्रसाल के अधीन हो गया| छत्रसाल के बाद किले पर पन्ना के हरदेव शाह का अधिकार हो गया| 
कालिंजर दुर्ग
1812 में यह किला अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया| एक समय कालिंजर चारों ओर से ऊंची दीवारों से घिरा हुआ था और इसमें चार प्रवेश द्वार थे| वर्तमान में कामता द्वार, पन्ना द्वार और रीवा द्वार नामक तीन प्रवेश द्वार ही शेष बचें हैं| ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण यह नगर पर्यटकों को बहुत पसंद आता है| पर्यटक यहाँ इतिहास से रूबरू होने के लिए नियमित रूप से आते रहते हैं| कालिंजर दुर्ग के विस्तार क्षेत्र की लम्बाई 1617.72 मी०(अधिकतम), 805.17 मी०(न्यूनतम) तथा चौड़ाई 1863.57 मी०(अधिकतम), 1655.40 मी०(न्यूनतम) है| दुर्ग की सीमा के अन्दर के कुछ अनछुए स्थलों का विवरण इस प्रकार है -   
    सीता सेज: सप्तम फाटक के पश्चात् जो सैनिक शिविर है उसी के निकट पत्थर काटकर अत्यंत सुन्दर पलंग और तकिया बनाया गया है

सीता सेज 
यह शैलोत्कीर्ण एक लघु कक्ष (गुफा) के अन्दर है| इसी स्थान को सीता सेज की संज्ञा दी गयी है| इस गुफा के अन्दर के उत्कीर्ण लेखों से ज्ञात होता है कि यह स्थान चंदेलों के आगमन से पूर्व का है|
शैलोत्कीर्ण शिलालेख 
 इस स्थान के सम्बन्ध में जो किम्वदन्ती प्रचलित है वह यह है कि भगवान श्री राम व सीता ने लंका से लौटते समय विश्राम किया था| इस किम्वदन्ती की वास्तविकता कुछ भी हो आज भी लोग इसे धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण समझते हैं| इस गुफा के अन्दर छत में वस्त्र रखने हेतु महराबदार भाग कटे हुए हैं|
वस्त्र रखने हेतु महराबदार भाग 
 गुफा में प्रवेश करने हेतु 100 से०मी० लम्बा तथा 51 से०मी० चौड़ा द्वार है| अन्दर 243 से०मी० लम्बी तथा 100 से०मी० चौड़ी आयताकार सेज है, जिसकी जमीन से ऊँचाई 58 से०मी० है तथा सेज की मोटाई 15 से०मी० है| सेज पर दक्षिण की ओर 18 से०मी० ऊंची, 27 से०मी० चौड़ी तथा 84 से०मी०लम्बी तकिया बनी हुई है| 


गुफा में प्रवेश हेतु द्वार 
        सीता कुण्ड: सीता सेज के समीप ही एक सीता कुंद है जो कि प्राकृतिक जलाशय है| यह एक छोटा सा स्वच्छ जल का कुण्ड है जो चट्टान के भीतर पोले स्थान में है तथा दुर्ग दीवार से 2-3 गज दूर है कुण्ड के ऊपर चट्टान पर एक बैठी हुई दो फीट ऊंची मूर्ति है, यह हाथ का सहारा लिए हुए है और निकट ही एक टोकरी है| यहाँ के पुजारी आदि इसे चौकीदार कहते हैं| इस मूर्ति के दाहिने कंधे पर एक अपठनीय शिलालेख है| इसके सामने दुर्ग  दीवार टूटी हुई है| इस कुण्ड में कुल 15 सीढ़ियाँ हैं| सबसे नीचे वाली सीढ़ी की लम्बाई 220 से०मी०, चौड़ाई 34 से०मी० तथा ऊँचाई 27 से०मी० है| कुण्ड की गहराई 94 से०मी० है|  
चट्टान के भीतर पोला स्थान 
सीता कुण्ड 


चौकीदार 

पातालगंगा: सीता सेज के आगे बढ़ने पर पातालगंगा मिलती है, इसे कालिंजर महात्म्य में वाण गंगा नाम से सम्बोधित किया गया है| इसकी बनावट अत्यंत आश्चर्यजनक है| जिस प्रकार कोयले तथा नमक की खानों में सुरंगे बनाई जाती हैं, उसी प्रकार की एक कड़ी सुरंग कुएं के रूप में 40-50 फीट नीचे तक 20-25 फीट चौड़ाई में बनाई गयी हैं| उसके अन्दर जाने के लिए छेनी से गढ़ी हुई सीढ़ियाँ हैं जो चट्टानों को काटकर घुमावदार नीचे की ओर पानी तक बनाई गयी हैं| सीढ़ियों की संख्या 88 है जो टेढ़ी-मेढ़ी तथा टूटी हुई सी हैं| सुरंग के नीचे एक बड़ा सा शुद्ध जल का कुण्ड है जिसकी गहराई18 से०मी० है तथा कुण्ड के मुहाने की चौड़ाई 200 से०मी० है| यह गुहा खुरदरी है, अतः प्राकृतिक सी ही प्रतीत होती है, जहाँ उतरने का मार्ग चट्टान काटकर बनाया गया है|
पातालगंगा प्रवेश द्वार 
 उसके सम्यक निरीक्षण से यह ज्ञात होता है कि उतरने का यह मार्ग पहले प्राकृतिक दरार के रूप में था, जिसे काटकर अब कृत्रिम बना दिया गया है| यदि ऐसा न किया जाता तो यह स्थान बिलकुल अज्ञात बना रहता| ऊपर से इसका जल बिलकुल नहीं दिखलाई पड़ता| नीचे उतरने का मार्ग एक बड़ी चट्टान के नीचे है जो दुर्ग दीवार से मिलती है| सीढ़ियाँ सीधे नीचे की ओर जाती हैं जिनकी ऊँचाई एक समान नहीं है| आधी दूर तक नीचे जाने पर बायीं ओर रिक्त स्थान है जहाँ चट्टान टूट गयी है| यहाँ पहाड़ी के नीचे का दृश्य दिखलाई पड़ता है|
घुमावदार सीढ़ियाँ 

टूटी हुई चट्टान

सीढ़ियाँ नीचे से 
  लगभग 20 फीट नीचे चलने पर एक ओर एक झरोखा है किन्तु उसका आकर बहुत छोटा है| जब नीचे की सतह लगभग 20 फीट रह जाती है तब सीधी गहराई समाप्त हो जाती है| नीचे जल की सतह और छत में लगभग 3 फीट की दूरी है| छत निराधार है, उसमें कोई स्तम्भ नहीं है| इसमें निरंतर जल टपकता रहता है|    
पाण्डु कुण्ड: पातालगंगा से आगे बढ़ने पर दीवार के बाहर एक चट्टान का उभरा हुआ भाग मिलता है जिसमें एक कुण्ड है| यहाँ चट्टान पर 5 पांडवों की आकृति उभरी हुई है जिससे यह पाण्डु कुण्ड के नाम से प्रसिद्ध है| यहाँ पर जाने के लिए चट्टान तथा दीवार के बीच एक अँधेरा मार्ग है| फिर 8 सीढ़ियों के बाद छिछला गोल कुण्ड है जिसकी गहराई 37 से०मी० तथा व्यास उत्तर-दक्षिण दिशा में 386 से०मी० और पूर्व-पश्चिम दिशा में 498 से०मी० है|     
चट्टान तथा दीवार के बीच से मार्ग                                       

छिछला कुण्ड 

5-पांडवों की उभरी हुई आकृति 
                                                      चुनौतियाँ   
जब हमने अपने सहपाठियों से कालिंजर चलने के लिए आग्रह किया तो उन्होंने सीधा प्रश्न किया की वहाँ आवागमन के क्या साधन हैं? मैंने कुछ अन्य रिश्तेदारों से आग्रह किया तो उन्होंने प्रश्न किया की वहाँ ठहरने के लिए आरामदेह स्थल है तथा वहाँ हम ऐसा क्या देखेंगे? कालिंजर के बारे में जितनी जानकारी मेरे पास थी मैंने उन्हें दी, मगर वे किसी भी हालत में कालिंजर जाने के लिए तैयार नहीं हुए| वहाँ पहुँच कर मुझे एहसास हुआ कि कालिंजर वास्तव में बहुत ही अच्छा ऐतिहासिक स्थल है किन्तु अफ़सोस यह था कि ऐतिहासिक स्थलों के सन्दर्भ में कोई ऐसा गाइड यहाँ नहीं है जो इन स्थलों की जानकारी आने वाले वाले पर्यटकों को दे सके| इसलिए कोई पर्यटक यहाँ आने की चेष्टा नहीं करता, क्योंकि उन्हें कोई इस स्थल के विषय में जानकारी देने वाला विशिष्ट जानकार नहीं है|
वहाँ पुरातत्व विभाग में तथा दुर्ग के नीचे कालिंजर बस्ती वालों के पास भी कोई पुस्तक एवं मानचित्र कालिंजर के विषय में नहीं मिल सका| हमने पाया कि दुर्ग के ऊपर जो जलाशय हैं उनका जल पूरी तरह से प्रदूषित हो चुका है तथा पीने योग्य जल भी कुछ ही जलस्त्रोतों से प्राप्त होता है| पुरातत्व विन्हाग की ओर से पीने के पानी की व्यवस्था कुछ ही स्थानों पर कराई गयी है, जिससे पर्यटकों को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है| दुर्ग के ऊपर किसी प्रकार की व्यवस्था नहीं है|
इस प्रकार हम देखते हैं कि कालिंजर के इतिहास तथा यहाँ के वास्तुशिल्प एवं प्रकृति की सुन्दरता के बावजूद, साधनों के अभाव के कारण यहाँ आये हुए यात्री किन्हीं अन्य यात्रियों को यहाँ आने की सलाह नहीं देते, जिसके कारण यहाँ यात्रियों का आगमन अभी अन्य पर्यटन स्थलों की तरह नहीं हो पाया है| अतः कालिंजर क्षेत्र की चुनौतियाँ इस प्रकार हैं-
1.आवागमन के साधनों का अभाव|
2.पर्यटकों की सुरक्षा व्यवस्था का अभाव|
3.पर्यटकों के मनोरंजन के साधनों का अभाव|
4.पर्यटकों की आवासीय व्यवस्था का अभाव|
5.पर्यटकों के लिए कालिंजर से सम्बन्धित प्रचार सामग्री का अभाव|
6.पर्यटकों के लिए उचित मार्ग दर्शकों (गाइडों) का अभाव|
7.कला संस्कृति से जुड़ी हुई लोक कलाओं का अभाव|
8.वहाँ के जीर्ण-शीर्ण जलाशयों का पुनर्निर्माण न होना|
9.इन जल स्त्रोतों की नियमित सफाई का अभाव|
10.कालिंजर क्षेत्र की मूर्तियों आदि विरासतों का उचित रख-रखाव न होना|
                                       सुझाव
चुनौतियाँ बहुत ही संवेदनशील होने के कारण उनसे निपटने के सुझाव भी उतने ही कारगर होने चाहिए जितनी शक्तिशाली चुनौतियाँ हैं| अतः व्यक्तिगत और शासन स्तर पर मिलकर हमें ऐसे भागीरथ प्रयास करने होंगे जिससे की इन चुनौतियों से सरलतापूर्वक निपटा जा सके|
1.कालिंजर को विश्व विरासत स्थलों की सूची में शामिल किये जाने के लिए प्रयास किया जाना चाहिए|
2.कालिंजर तक आगमन के साधनों का विकास तीव्र गति से किया जाय|
3.कालिंजर में पर्यटकों के आवास के लिए समुचित व्यवस्था हो|
4.कालिंजर में विकास प्राधिकरण की स्थापना तथा मॉडल टाउन के रूप में विकसित किया जाय|
5.यहाँ  पर जुड़ी हुई लोक संगीत परम्पराओं को विकसित करके समय-समय पर उनका प्रस्तुतीकरण हो|
6.कालिंजर के इतिहास को पर्यटन की दृष्टि से लिखकर उसका प्रचार-प्रसार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किया जाय|
7.कालिंजर महोत्सव आयोजन प्रतिवर्ष किया जाय और विदेशी पर्यटकों को आकर्षित किया जाय|
8.परम्परागत कुटीर उद्योगों को विकसित किया जाय|
9.किले की जो रक्षा प्राचीरें ध्वस्त हो चुकी हैं उनका नव निर्माण होना चाहिए, जिससे किले की ऐतिहासिक विरासत को सुरक्षित किया जा सके|
 10.किले के भीतर स्थित विशाल मैदान में वृक्षारोपण के लिए प्रयास किये जाने चाहिए जिससे किले में प्राकृतिक सौंदर्य विकसित हो सके|
11.जलाशयों का पुनर्निर्माण कराकर सभी जलस्त्रोतों की नियमित सफाई की व्यवस्था होनी चाहिए|
12.किले से सम्बन्धित समस्त विवरण को दर्शाता हुआ शिलालेख स्थापित किया जाना चाहिए| banda.nic.in पर पर्यटक स्थलों की सूची में कालिंजर का विवरण विस्तृत रूप से उपलब्ध कराया जाना चाहिए| कालिंजर दुर्ग की वेबसाइट Kalinjarfort.in पर इन स्थलों की जानकारी के सन्दर्भ में कोई जिक्र नहीं है और न ही इन स्थलों से सम्बन्धित चित्र दीर्घा में कोई चित्र ही उपलब्ध है| अतः Kalinjarfort.in में इन स्थलों की विस्तृत जानकारी देते हुए चित्रों के माध्यम से समृद्ध किया जाना चाहिए| 
13.ध्वनि एवं प्रकाश कार्यक्रम की व्यवस्था की जानी चाहिए|
14.लेसर शो की व्यवस्था की जानी चाहिए|
15.जिप लाइनिंग द्वारा कालिंजर पर्वत पर स्थित किले के नीचे आने जाने के साहसिक पथ का निर्माण किया जा सकता है| जिससे पर्यटकों का ध्यान आकर्षित किया जा सके|
                                                निष्कर्ष
कालिंजर किला जो कि मेरे परियोजना कार्य का विषय है, इसके अंतर्गत मेरे द्वारा पूर्ण मनोयोग से निरीक्षण किया गया, जिसमें पाया गया कि कालिंजर किले के पुरातत्व विभाग के अधीन होने के पश्चात यहाँ की व्यवस्थाओं में काफी कुछ सुधार हुए हैं, फिर भी ये अपर्याप्त हैं जिसका कारण है प्रशासन की उदासीनता| अतः शासन प्रशासन का प्रमुख दायित्व है कि व्यवस्थाओं को सुचारू रूप प्रदान कर किले के संरक्षण हेतु भागीरथ प्रयास किये जाएँ जिससे किले की ऐतिहासिक विरासत समृद्ध एवं अक्षुण्ण रहे|               

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